नवरात्रि उत्सव कैसे मनाएँ !
नवरात्रि हिन्दू धर्म में मनाया जाने वाला एक प्रमुख त्यौहार है। नवरात्रि का अर्थ इसके नाम में ही छिपा है। नव+रात्रि, अर्थात नव रातों तक चलने वाला त्यौहार।इन नौ दिनों में माता के भक्त बड़ी ही श्रद्धा और लगन से माँ के नोरूपों की पूजा करते हैं। नौ रुपों की जानकारी इस प्रकार से है।
१-शैलपुत्री -
नवरात्रि के प्रथम दिन माँ शैलपुत्री की पूजा की जाती है। शैलपुत्री का मतलब होता है शैल अर्थात पर्वत की पुत्री।
ये कहानी इस प्रकार से है कि माँ पार्वती का पूर्व जन्म राजा दक्ष के यहॉं हुआ था,जहाँ पर उनका नाम सती था। सती का विवाह भोले बाबा अर्थात शंकरजी से हुआ। किन्तु शंकरजी और राजा दक्ष अर्थात ससुर दामाद के बीच मान सम्मान को लेकर मनमुटाव था। इसलिए एकबार दक्ष ने अपने यहाँ एक बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को ससम्मान आहूत किया,किन्तु शंकरजी को नीचा दिखाने के लिए उनको और अपनी बेटी को नहीं बुलाया।
यज्ञ के दिन सरे देवता अपने अपने वाहन से दक्षराज के यज्ञ शाला की तरफ जाने लगे तो सती जी ने शिवजी से इसके बारे में जानने की इक्षा जताई, और शिवजी ने सारी बातें सती से बता दी। अब सती ने अपने पिता के घर जानें की बात कहीं। शंकर जी कहा की बिना बुलाये कहीं भी नही जाना चाहिए। सती ने उत्तर दिया की माता-पिता-और गुरु के घर बिना बुलाये भी जाया जा सकता है। जब सती अपनी जिद पर अड़ी रहीं तो शिव जी ने कहा की ठीक है जाओ। जबकी शिवजी को भविष्य में होने वाली सारी घटनाएं पता थी। इसी सन्दर्भ में संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसी दास जी रामचरित मानस में लिखते है कि --
शिव संकल्प कीन्ह मन माहीं। एहि तन सती भेंट अब नहीं।।
सती ने मायके में पहुँच कर अपना और शिव जी का अपमान देखा तो उनसे बर्दास्त नहीं हुआ और वह वही यज्ञ शाला में कूद कर अपना जान दे दी। और माँ सती का अगला जन्म पर्वतराज हिमालय के यहाँ रानी सुनैना के गर्भ से हुआ। इस जन्म में नाम पड़ा पार्वती, भवानी,शैलपुत्री ,हेमसुता,अपर्णा। माँ पार्वती का विवाह फिर से भोले भंडारी के साथ शिवरात्रि के दिन संपन्न हुआ।
माँ शैलपुत्री को बड़े ही मोहक रूप में दिखाया गया है। माता को पर्वत पर विराजमान माथे पर अर्धचंद्र एक हाथ में त्रिशूल दूसरे में अधोमुखी कमल है। माँ शैलपुत्री का मंत्र इस प्रकार से है-
ऊं देवी शैल पुत्र्यः नमः।
२-ब्रह्मचारिणी-
ब्रह्मचारिणी का अर्थ है ब्रह्मचर्य के मार्ग पर चलने वाली। नवरात्रि के दुसरे दिन देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। अब भगवती ब्रह्मचारिणी की पूजा अर्चन के पहले उनकी पूजा करने वाले भक्तों को उनके बारे जान लेना आवश्यक और समीचीन प्रतीत होता है। भगवती ब्रम्चारिणी का जन्म विष्णुयश यहाँ हुआ था। माता पिता ने ब्रह्मचारिणी के जीवन साथी के रूप में पितृशर्मा को चुना। इनके बच्चों में ऋक,यजुष,साम,और अथवा का नाम आता है। और पौत्र पीढ़ी में व्याडि,लोकविश्रुत,मीमांस,वररुचि और पाणिनी का नाम आता है। ये सारी जानकारी भविष्य पुराण से ली गयी है। माँ का भगवती का स्वरुप बड़ा ही सुखदायक और भव भय हारी है। तीनों तापों (दैहिक,दैविक,भौतिक ) मिटाने वाला है।
पूजा का दिन - नवरात्रि का दूसरा दिन।
स्वरुप- दाहिने हाथ में जप माला , बाएं हाथ में कमंडल।
वाहन - पैदल गमन
मंत्र- ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः।
३-चंद्र घंटा -
नवरात्रि के तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा के पूजन का विधान है,माँ दुर्गा के इस रूप की सवारी सिंह तथा अस्त्र कमल है तथा जीवन साथी के रूप में में शिवजी होते हैं । माँ चंद्रघंटा की पूजा करने वाले भक्तों को विभिन्न अलौकिक तथा लौकिक अनुभूतियाँ होती है। जब साधना सिद्ध होने लगती है तो पूजन के समय मोहक महक का आभास होने लगता है। विभिन्न प्रकार की दिव्य घंटा,शंख,मृदंग की ध्वनि सुनाई पड़ने लगती है।इस समय भक्तों को बहुत ही सावधान होने की आवश्यकता होती है।
माँ दुर्गा का ये तीसरा स्वरुप लोककल्याणकारी होता है। विश्व को शांति देने वाला तथा पराम् शान्ति का द्योतक होता है। इनके माथे पर अर्धचंद्र होने के कारण ही इनका नाम चंद्रघंटा के रूप में जाना जाता है। भवानी के शरीर की आभा स्वर्णकांतियुक्त है। दसों भुजाओं में खड्ग,परशु,तोमर,मुद्गर,कृपाण आदि अस्त्र शस्त्र विभूषित हैं। मैया का वाहन सिंह है,तथा इनकी मुद्रा हमेशा युद्ध में जाने को उद्यत दिखती है।
जो भक्त माता रानी के इस स्वरुप की पूजा करता है,वह इस धरती पर अपने पुत्रपौत्र आदि के साथ सुख भोगता है और अंत समय में माताजी के धाम में स्थान पाता है। मैया की कृपा से भक्तों के समस्त पाप धूल जाते हैं। जीवन में आने वाली समस्त समस्याएं भक्तों तक पहुँचने के पहले ही समाप्त हो जाती है। उपासक के अंदर माँ की कृपा से अपने समस्त बाधाओं से लड़ने की शक्ति का उद्भव होता है। मैया के घंटे की ध्वनि से प्रेतबाधा समाप्त हो जाती है। माँ का रूप अत्यंत सौम्य तथा शांतिअभामण्डल से ओत -प्रोत होने के कारण भक्तों पर भी ऐसी ही छाया का दर्शन होने लगता है। उपासक जहाँ कहीं भी जाते है,वहाँ परिवेश बड़ा ही मोहक तथा सात्विक हो जाता है। साधक के शरीर से असंख्य तथा अनगिनत परमाणु आभा निकलकर परिवेश को दोषमुक्त करती है।
साधक को चाहिए कि माँ की साधना प्रारम्भ करने के पहले स्वयं को मन कर्म वाणी से शुद्ध कर ले,उसके बाद अपने आप को पूर्णरूपेण माँ की शरण में होकर विधिविधान से माँ की पूजा भक्ति पूरी श्रद्धा से करे। हमें निरंतर माता के विग्रह को ध्यान में रखकर रहना चाहिए। या देवी सर्वभूतेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता ,नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः। इस श्लोक का दिन भर जप करते रहना चाहिए। आज के दिन किसी सुहागन तथा स्वस्थ महिला को अपने घर पर बुलाकर उसकी पूजा करके दही और हलवा खिलाकर कलश का दान करके मंदिर की घंटी भेंट करना चाहिए।
माँ भगवती चंद्रघंटा
या देवी सर्वभूतेषु चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता ,, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
४ -कूष्मांडा -
माँ भगवती चंद्रघंटा
या देवी सर्वभूतेषु चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता ,, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
माँ भगवती दुर्गा का चौथा स्वरुप,सात हाथों में कमंडल,धनुष-वाण,कमल पुष्प,अमृतपूर्ण कलश,चक्र और गदा जबकि आठवें हाथ में अष्टसिद्धि नवनिधि प्रदान करने वाली जपमाला धारण किये हुए,शेर पर सवार शिवसंगिणी रूप में है। माँ कूष्माण्डा देवी को आदि स्वरूपा आदि शक्ति के रूप में भी जाना जाता है। देवी का निवास स्थान सूर्य के आभामंडल के मध्य होने के कारण इनकी कांति भी सूर्य के ही सामान है। माँ कूष्माण्डा के प्रभामंडल से दसों दिशाए देदीप्यमान हो रही है।आठ भुजा होने के ही कारन इन्हें अष्टभुजा के नाम से भी जाना जाता है।
माँ कूष्माण्डा अत्यल्प पूजन साधना से ही प्रसन्न होकर अपने भक्तों की सारी मनोकामनाओं को पूरा कर देती है। और अंत में परम पद की भी प्राप्ति हो जाती है। अलप प्रयास से ही भक्तों को अन्न,धन,परिवार,मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। ऐसे में वो सहज मूढ़मति ही होगा जो माँ की शरणागति न हो जाए।
सहज लहहिं नर सुख कर गेहा , कमल चरण पर नित करु नेहा।।
होइ सुलभ सुख सम्पति नाना, कस न भजसि तजि तव अभिमाना।।
मन्त्र-या देवी सर्वभूतेषु माँ कूष्मांडारूपेण संस्थिता,नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।
नवरात्रि के चौथे दिन इसी मन्त्र से माँ कूष्माण्डा देवी की उपासना इसी मन्त्र से करनी चाहिए। इस दिन किसी बड़ी उम्र की महिला का पूजन करके ,उत्तमविधि से भोजन करके फल ,वस्त्र,सौभाग्य की वस्तुएं दान देनी चाहिए ,ऐसा करके भक्तों को सारी प्रकार के सुख संपत्ति प्राप्त हो जाती है। माँ कूष्माण्डा सारे सुख,संपत्ति,ऐश्वर्य,यश,मान,सम्मान,को प्रदा करने वाली देवी है.
माँ कूष्माण्डा देवी
५-स्कन्द माता
नवरात्रि का पाँचवाँ दिन स्कन्द माता के पूजन का दिन होता है। मैया दुर्गा अपने इसी रूप में भक्तों के सारे कष्टों को हर कर सुख संपत्ति देने का काम करती है। इस जनम में सारे सुखो का द्वार खोल देती हैं। इतना ही नहीं अंत में सद्गति प्रदान करके विष्णुधाम का रास्ता भी बता देती हैं। अब आपकी जिज्ञासा का शमन करने के लिए ये भी बता दूँ की मैया का ये नाम कुमार कार्तिकेय अर्थात स्कन्द कुमार की माता होने के कारण मिला।
मैया का ये रूप बड़ा ही शुभ्र,कल्याणकारी है। माता कमल के आसान पर विराजमान कहोने के कारण पद्मासना नाम से भी जानी जाती हैं। इनके हाथों में भी कमलपुष्प सुशोभित हो रहे है। मातारानी के इस रूप की पूजा करने वाले भक्तों मन सारी वाह्य वृत्तियों से हटकर शान्त हो जाता है। उसकी विह्वलता दूर हो जाती है। वह मातारानी के अनंत स्वरुप का का हिस्सा बन जाता है। वह विशुद्ध चैतन्यस्वरूप हो जाता है। सांसारिक बंधनों से मुक्त हो जाता है। बाहरी दुनिया से विरक्त होकर भक्त माँ स्कंदमाता के चरणों का अनुरागी हो जाता है। उसकी सारी इच्छाएं पूर्ण हो जाती है। अब इस दुनिया में उसके लिए कुछ भी पाना शेष नही रह जाता है। सूर्यमण्डल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण भक्त भी सूर्य की तरह चतुर्दिक विख्यात हो जाता है।
हमें एकाग्र मन से माता की शरण में जाना चाहिए। यह संसार दुखों का सागर है,अनंत ईच्छाओं का गहरा सागर है। इस संसार से मुक्ति पाकर परमधाम को प्राप्त करने के लिए मातारानी की शरणागति ही एकमात्र रास्ता है।
नवरात्रि का पाँचवाँ दिन स्कन्द माता के पूजन का दिन होता है। मैया दुर्गा अपने इसी रूप में भक्तों के सारे कष्टों को हर कर सुख संपत्ति देने का काम करती है। इस जनम में सारे सुखो का द्वार खोल देती हैं। इतना ही नहीं अंत में सद्गति प्रदान करके विष्णुधाम का रास्ता भी बता देती हैं। अब आपकी जिज्ञासा का शमन करने के लिए ये भी बता दूँ की मैया का ये नाम कुमार कार्तिकेय अर्थात स्कन्द कुमार की माता होने के कारण मिला।
मैया का ये रूप बड़ा ही शुभ्र,कल्याणकारी है। माता कमल के आसान पर विराजमान कहोने के कारण पद्मासना नाम से भी जानी जाती हैं। इनके हाथों में भी कमलपुष्प सुशोभित हो रहे है। मातारानी के इस रूप की पूजा करने वाले भक्तों मन सारी वाह्य वृत्तियों से हटकर शान्त हो जाता है। उसकी विह्वलता दूर हो जाती है। वह मातारानी के अनंत स्वरुप का का हिस्सा बन जाता है। वह विशुद्ध चैतन्यस्वरूप हो जाता है। सांसारिक बंधनों से मुक्त हो जाता है। बाहरी दुनिया से विरक्त होकर भक्त माँ स्कंदमाता के चरणों का अनुरागी हो जाता है। उसकी सारी इच्छाएं पूर्ण हो जाती है। अब इस दुनिया में उसके लिए कुछ भी पाना शेष नही रह जाता है। सूर्यमण्डल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण भक्त भी सूर्य की तरह चतुर्दिक विख्यात हो जाता है।
हमें एकाग्र मन से माता की शरण में जाना चाहिए। यह संसार दुखों का सागर है,अनंत ईच्छाओं का गहरा सागर है। इस संसार से मुक्ति पाकर परमधाम को प्राप्त करने के लिए मातारानी की शरणागति ही एकमात्र रास्ता है।
कात्यायनी, यह माता दुर्गा छठवाँ रूप है,मातारानी का यह रूप भक्तों के जन्म-जन्मांतर के आधि व्याधि रोग,शोक,पापादि को सर्वथा नष्ट कर देता है। ॐ कात्यायनी महामाये महायोगिन्यधीश्वरि। नन्दगोपसुतम देवि पतिम में कुरुते नमः।। यह श्लोक उन कन्याओं के द्वारा जाप करने चाहिए जिनकी शादी में विलम्ब हो रहा है। हर भक्त को अपनें जन्मजन्मांतर के पापों को नष्ट करने केलिए मातारानी की शरण में चाहिए।
माता कात्यायिनी प्राकट्य महर्षि कत के पुत्र ऋषि कात्य के गोत्र में महर्षि कात्यायन की कठिन तपस्या के फलस्वरूप हुआ। इन्ही का नाम कात्यायिनी के जाना जाता है। माँ कात्यायिनी अमोघ वरदायिनी हैं। कात्यायिनी देवी ब्रज मंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में मानी जाती है। क्योंकि ब्रज की गोपियाँ भी श्री कृष्ण को अपने पति के रूप में पाने के लिए माँ कात्यायिनी की पूजा जी थी।
माँ कात्यायिनी का रूप अत्यंत तेजोमय,चार भुजा युक्त है। माता की उपासना और भक्ति द्वारा मनुष्य को बड़ी ही आसानी से धर्म,अर्थ,काम तथा मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।
कात्यायिनी देवी
७-कालरात्रि -
माँ का सातवां रूप कालरात्रि का है,इनकी पूजा का विधान नवरात्रि की सातवीं रात्रि को है।मान के शरीर का रंग रात्रि के सामान एकदम काला है इसीलिए इनका नाम कालररात्रि है। माता की तीन आँखें सूर्य के सामान गोल है। नाक के नथुनों से अग्नि की लपटें निकलती रहती है। बायें तरफ के दोनों हाथों में लोहे का काँटा और खड्ग है। दाहिने तरफ के दोनों हाथ क्रमशः वर मुद्रा तथा अभय मुद्रा में है। कालरात्रि का रूप जितना भी भयंकर क्यों न हो किन्तु माता दया का द्वार हैं ,वरदानों की देवी हैं। सारे सुखों के भण्डार देनेवाली हैं। इसी लिए इनका एक नाम शुभंकरी भी है। कालरात्रि की उपासना करने से पृथ्वी लोक के सारे सुखसाधन अनायास ही प्राप्त हो जाते है। नाम मात्र स्मरण से ही भूत,प्रेत,शाकिनी,डाकिनी,यक्षिणी,वैताल ,राक्षस आदि कोसों दूर रहतें है। इसी लिए यदि इस संसार में ऐसी बुरी शक्तियों से बच कर रहना है,और ब्रह्माण्ड के सारे सुख ऐश्वर्य भोगना है तो माता कालरात्रि की शरण में जाओ।
मात्रा-
एकवेणी जपाकर्णपूरा नाना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तिशरीरिणी।।
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।
वर्धनमूर्ध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी।।
कालरात्रि माँ
८-महागौरी-
माँ दुर्गा का आठवाँ विग्रह माता महागौरी के रूप में माना जाता है।नवरात्रि के आठवें दिन महागौरी की उपासना की जाती है। महागौरी की उपासना करने वाले भक्तों के जन्मजन्मांतर के सारे दुःख दूर हो जाते हैं तथा साथ साथ ही भविष्य में आने वाली दुःख की छाया भी आने के पहले ही समाप्त हो जाती है। और अंत समय में भक्त परम धाम का अधिकारी बन जाता है। माँ गौरी के सम्बन्ध में पुराणों में ढेर सारी कथाएं आती हैं। उन कथाओं का सम्बन्ध महागौरी के जीवन के अनेक क्षणों से जोड़ा गया है। जैसे-
१- महागौरी का नाम "महागौरी" क्यों पड़ा ?
एक बार शिवजी ने माँ गौरी को विनोद में कुछ व्यंग बोल दियाऔर इस बात बा माता गौरी शिवजी से नाराज होकर तपस्या के लिए बैठ गयी। भोले बाबा भी अपनी भूल सुधारने के लिए माता गौरी के पास पहुँचे तो देखा की उमा का शरीर बिलकुल काला पद गया था। शिवजी ने अपने आशीर्वाद से मातारानी के शरीर को फिर से पूर्ण रूप से गोरा बना दिया। तभी से माँ का नाम महागौरी पड गया।
२-मैया के अपर्णा नाम के पीछे क्या राज हैं ?
सती रूप का त्याग करने के बाद माँ ने हिमालयसुता क्वे रूप में पर्वतराज के यहां जन्म लिया। किन्तु इस जन्म में भी इनकी प्रीति भगवान् शिव जी बनी रही। जबकि पिता हिमालय अपनी सुन्दर सुशील बेटी का विवाह उस नंग,धडंग खहक भभूत लपेटे,भूत प्रेत के संग रहने वाले शंकर जी से करने के पक्ष में नहीं थे। जबकि उमा (बाद का नाम महागौरी) शिवजी को ही अपने पति के रूप में पाना चाहती थीं। इसलिए उमा ने हजार वर्षों तक हवा पीकर, पेड़ों की पट्टियां खाकर तपस्या की। उसके बाद माता ने पत्तियों को भी खाना छोड़ दिया,इसीलिए उनका नाम अपर्णा पड़ गया।
३-एक और कहानी के अनुसार एकबार उमा की सहेलियों ने उमा का अपहरण कर लिया (खेल खेल में )तभी से हरितालिका व्रत की शुरुआत हुई। हरितालिका शब्द दो शब्दों के मेल से बना है। हरित +अलिका जिसमे हरित का मतलब है अपहरण और अलिका का अर्थ है सहेली या सखी।
४-मातारानी की सवारी शेर क्यों ?
एक बार गौरी एक गुफा में अपनी तपस्या लीन थी,उसी समय वहां पर एक शेर आया, और गौरी को देखकर उसकी भूख जागृत हो गयी। किन्तु शेर ने तपस्या तक इंतज़ार करने का निर्णय लिया। जब माँ की तपस्या ख़तम हुई,तब तक शेर इतना दुर्बल और कमजोर हो चुका था की वह चल फिर भी नहीं चल सकता था। उसकी ऐसी दशा देख कर माता को उस शेर पर दया आ गयी और उसे अपनी सवारी बना ली।
महागौरी पूजन विधि -
अष्टमी के दिन महिलाये माता का शृंगार करके ,श्रृंगार के सारे सामान चढ़ाएं,खीर,बतासा,हलवा का भोग लगाएं,और पंचोपचार पूजन करें
मन्त्र -
या देवी सर्वभूतेषु माँ गौरी रूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
महागौरी माताजी
९- सिद्धिदात्री -
यह रूप माँ का नौवां और आखिरी रूप है। इसी रूप माँ अपने भक्तों को सारी सिद्धियाँ प्रदान करती हैं। माँ के सिद्धिदात्री रूप का पूजन नवरात्रि के दिन विधि विधान करने वाले मनुष्यों के लिए इस धरती पर कुछ भी अगम नहीं रह जाता है।
सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैसुरैरमरैरपि। सेव्यमाना सदा भूयात सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।।
मार्कण्डेय पुराण के अनुसार माँ सिद्धिदात्री अपने भक्तों को सारी सिद्धियाँ ( अणिमा,महिमा,गरिमा,लघिमा,प्राप्ति,प्राकाम्य,ईशित्व,और वशित्व) देने वाली होती है। देवीपुराण में गया है कि शिवजी को आठों सिद्धिया माँ सिद्धिदात्री से ही प्राप्त हुई थी। और तो और शिवजी का अर्धनारीश्वर रूप भी माता रानी के ही कारण हुआ था।
माँ सद्धिदात्री सिंह पर सवार,कमल पर आसीन, चार भुजाओं वाले स्वरुप में दिखाया गया है।माँ के इस अंतिम रूप का पूजन भजन मनन करने वाला व्यक्ति कभी भी निराश नहीं होता है।
नवरात्रि हिंदुओं का एक विशेष पर्व है। नवरात्रि शब्द एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है 'नौ रातें'। इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान, शक्ति / देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। दसवाँ दिन दशहरा के नाम से प्रसिद्ध है। नवरात्रि वर्ष में चार बार आता है। पौष , चैत्र , आषाढ , अश्विन प्रतिपदा से नवमी तक मनाया जाता है। नवरात्रि के नौ रातों में तीन देवियों - महालक्ष्मी , महासरस्वती या सरस्वती और दुर्गा के नौ स्वरुपों की पूजा होती है जिन्हें नवरात्रि कहते हैं। इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान, शक्ति / देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। दुर्गा का मतलब जीवन के दुख कॊ हटानेवाली होती है। नवरात्रि एक महत्वपूर्ण प्रमुख त्योहार है जिसे पूरे भारत में महान उत्साह के साथ मनाया जाता है।
नवरात्रि भारत के विभिन्न भागों में अलग तरीके से मनायी जाती है। गुजरात में इस त्योहार को बड़े पैमाने से मनाया जाता है। गुजरात में नवरात्रि समारोह डांडिया और गरबा के रूप में जान पड़ता है। यह पूरी रात भर चलता है। डांडिया का अनुभव बड़ा ही असाधारण है। देवी के सम्मान में भक्ति प्रदर्शन के रूप में गरबा, 'आरती' से पहले किया जाता है और डांडिया समारोह उसके बाद। पश्चिम बंगाल के राज्य में बंगालियों के मुख्य त्यौहारो में दुर्गा पूजा बंगाली कैलेंडर में, सबसे अलंकृत रूप में प्रकट किया गया है। इस अदभुत उत्सव का जश्न नीचे दक्षिण, मैसूर के राजसी क्वार्टर को पूरे महीने प्रकाशित करके मनाया जाता है।
नवरात्रि उत्सव देवी अंबा (विद्युत) का प्रतिनिधित्व है। वसंत की शुरुआत और शरद ऋतु की शुरुआत, जलवायु और सूरज के प्रभावों का महत्वपूर्ण संगम माना जाता है। ये दो समय मां दुर्गा की पूजा के लिए पवित्र अवसर माने जाते हैं। त्योहारों की खरीदारी चंद्र कैलेंडर के अनुसार निर्धारित होती हैं। नवरात्रि पर्व, माँ-दुर्गा की अवधारणा भक्ति और परमात्मा की शक्ति (उपत्त, परम, परम रचनात्मक ऊर्जा) की पूजा का सबसे शुभ और अनोखा काल माना जाता है। यह पूजा वैदिक युग से पहले, प्रागैतिहासिक काल से है। ऋषि के वैदिक युग के बाद से, नवरात्रि के दौरान की भक्ति भाव में से मुख्य रूप गायत्री साधना का हैं। नवरात्रि में देवी के शक्तिपीठ और सिद्धपीठों पर भारी मेले लगते हैं। माता के सभी शक्तिपीठों का महत्व अलग-अलग हैं। लेकिन माता का स्वरूप एक ही है। कहीं पर जम्मू कटरा के पास वैष्णो देवी बन जाती है। तो कहीं पर चामुंडा रूप में पूजी जाती है। बिलासपुर हिमाचल प्रदेश मे नैना देवी नाम से माता के मेले लगते हैं तो वहीं सहारनपुर में शाकुंभरी देवी के नाम से माता का भारी मेला लगता है।
नवरात्रि के पहले तीन दिन देवी दुर्गा की पूजा करने के लिए समर्पित किए गए हैं। यह उसकी ऊर्जा और शक्ति की पूजा करता है। प्रत्येक दिन दुर्गा के एक अलग रूप को समर्पित है।
व्यक्ति जब अहंकार, क्रोध, वासना और अन्य पशु प्रवृत्ति की बुराई करने पर विजय प्राप्त कर लेता है,
वह एशून्य का अनुभव करता है।] यह शून्य आध्यात्मिक धन से भर जाता है। कार्रवाई के लिए,
व्यक्ति सभी भौतिकवादी, आध्यात्मिक धन और समृद्धि ई प्राप्त करने के लिए देवी लक्ष्मी की पूजा करता है।
नवरात्रि के चौथे, चौथे और छठे दिन लक्ष्मी- समृद्धि और शांति की देवी, की पूजा करने के लिए समर्पित है।
शायद व्यक्ति सौभाग्य और धन पर विजय प्राप्त कर लेता है, पर वह अभी भी सच्चा ज्ञान से वंचित है।
ज्ञान एक मानव जीवन जीने के लिए आवश्यक है भले ही वह सत्ता और धन के साथ समृद्ध है। इसलिए,
नवरात्रि के पांच दिन देवी सरस्वती की पूजा की जाती है। सभी पुस्तकों और अन्य साहित्य सामग्रियों को
एक स्थान पर इकट्ठा कर दिया जाता हैं और एक दीया देवी आह्वान और आशीर्वाद लेने के लिए, देवता के सामने
जलाया जाता है।
वह एशून्य का अनुभव करता है।] यह शून्य आध्यात्मिक धन से भर जाता है। कार्रवाई के लिए,
व्यक्ति सभी भौतिकवादी, आध्यात्मिक धन और समृद्धि ई प्राप्त करने के लिए देवी लक्ष्मी की पूजा करता है।
नवरात्रि के चौथे, चौथे और छठे दिन लक्ष्मी- समृद्धि और शांति की देवी, की पूजा करने के लिए समर्पित है।
शायद व्यक्ति सौभाग्य और धन पर विजय प्राप्त कर लेता है, पर वह अभी भी सच्चा ज्ञान से वंचित है।
ज्ञान एक मानव जीवन जीने के लिए आवश्यक है भले ही वह सत्ता और धन के साथ समृद्ध है। इसलिए,
नवरात्रि के पांच दिन देवी सरस्वती की पूजा की जाती है। सभी पुस्तकों और अन्य साहित्य सामग्रियों को
एक स्थान पर इकट्ठा कर दिया जाता हैं और एक दीया देवी आह्वान और आशीर्वाद लेने के लिए, देवता के सामने
जलाया जाता है।
सातवें दिन , कला और ज्ञान की देवी, सरस्वती , की पूजा की है। प्रार्थनाएँ, आध्यात्मिक ज्ञान की तलाश के
उद्देश्य के साथ की जाती हैं। आठवे दिन पर एक 'यज्ञ' किया जाता है। यह एक बलिदान है जो देवी दुर्गा
को सम्मान और उन्हें विदा करता है। ...
उद्देश्य के साथ की जाती हैं। आठवे दिन पर एक 'यज्ञ' किया जाता है। यह एक बलिदान है जो देवी दुर्गा
को सम्मान और उन्हें विदा करता है। ...
नौवा दिन नवरात्रि का अंतिम दिन है। यह महानवमी के नाम से भी जाना जाता है।
इस दिन कन्या पूजन होता है। जिसमें नौ कन्याओं की पूजा होती है जो अभी तक यवन की अवस्था
तक नहीं पहुँचती है। इन नौ कन्याओं को देवी दुर्गा के नौ रूपों का प्रतीक माना जाता है।
कन्याओं का सम्मान और स्वागत करने के लिए उनके पैर धोए जाते हैं। पूजा के अंत में कन्याओं को
उपहार के रूप में नए कपड़े प्रदान किए जाते हैं।
इस दिन कन्या पूजन होता है। जिसमें नौ कन्याओं की पूजा होती है जो अभी तक यवन की अवस्था
तक नहीं पहुँचती है। इन नौ कन्याओं को देवी दुर्गा के नौ रूपों का प्रतीक माना जाता है।
कन्याओं का सम्मान और स्वागत करने के लिए उनके पैर धोए जाते हैं। पूजा के अंत में कन्याओं को
उपहार के रूप में नए कपड़े प्रदान किए जाते हैं।
लंका-युद्ध में ब्रह्माजी ने श्रीराम से रावण वध के लिए देवी देवी का पूजन कर देवी को प्रसन्न करने को कहा
और बताए अनुसार पूजा पूजन और हवन हेतु दुर्लभ एक सौ नीलकमल की व्यवस्था की गई। वहीं दूसरी ओर
रावण ने भी अमरता के लोभ में विजय कामना से नीति पाठ शुरू किया। यह बात इंद्र देव ने पवन देव के माध्यम
से श्रीराम के पास पहुंचाई और परामर्श दिया कि पाठ पाठ भगवानभवन पूर्ण होने दिया गया। इधर हवन सामग्री में
पूजा स्थल से एक नीलकमल रावण की मायावी शक्ति से गायब हो गई और राम का संकल्प टूटता-सा नजर आने
लगा। भय इस बात का था कि देवी माँ रुष्ट न हो जाएँ। दुर्लभ नीलकमल की व्यवस्था तत्काल असंभव थी, तब
भगवान राम को सहज ही स्मरण हुआ कि मुझे लोग 'कमलानयन नवकंच लोचन' कहते हैं, तो क्यों न संकल्प
पूर्ति के लिए एक नेत्र अर्पित कर दिया जाए और प्रभु राम जैसे ही तूकर से एक बाण निकालकर अपना नेत्र
निकालने के लिए तैयार हुए, तब देवी ने प्रकट ह हुई, हाथ पकड़कर कहा- राम मैं प्रसन्न हूं और विजयश्री का
आशीर्वाद दिया। वहीं रावण के शारीरिक पाठ में यज्ञ कर रहे ब्राह्मणों की सेवा में ब्राह्मण बालक का रूप धर
कर कर हनुमानजी सेवा में जुट गए। निस्वार्थ सेवा देखकर ब्राह्मणों ने हनुमानजी से वर माँगने को कहा।
इस पर हनुमान ने विनम्रतापूर्वक कहा- प्रभु, आप प्रसन्न हैं तो जिस मंत्र से यज्ञ कर रहे हैं, उसका एक
अक्षर मेरे कहने से बदल जाता है। ब्राह्मण इस रहस्य को समझने को संभव नहीं है। मंत्र में जयादेवी ...
भुरहरिणी में 'ह' के स्थान पर 'क' उच्चारित करें, यही मेरी इच्छा है। [
और बताए अनुसार पूजा पूजन और हवन हेतु दुर्लभ एक सौ नीलकमल की व्यवस्था की गई। वहीं दूसरी ओर
रावण ने भी अमरता के लोभ में विजय कामना से नीति पाठ शुरू किया। यह बात इंद्र देव ने पवन देव के माध्यम
से श्रीराम के पास पहुंचाई और परामर्श दिया कि पाठ पाठ भगवानभवन पूर्ण होने दिया गया। इधर हवन सामग्री में
पूजा स्थल से एक नीलकमल रावण की मायावी शक्ति से गायब हो गई और राम का संकल्प टूटता-सा नजर आने
लगा। भय इस बात का था कि देवी माँ रुष्ट न हो जाएँ। दुर्लभ नीलकमल की व्यवस्था तत्काल असंभव थी, तब
भगवान राम को सहज ही स्मरण हुआ कि मुझे लोग 'कमलानयन नवकंच लोचन' कहते हैं, तो क्यों न संकल्प
पूर्ति के लिए एक नेत्र अर्पित कर दिया जाए और प्रभु राम जैसे ही तूकर से एक बाण निकालकर अपना नेत्र
निकालने के लिए तैयार हुए, तब देवी ने प्रकट ह हुई, हाथ पकड़कर कहा- राम मैं प्रसन्न हूं और विजयश्री का
आशीर्वाद दिया। वहीं रावण के शारीरिक पाठ में यज्ञ कर रहे ब्राह्मणों की सेवा में ब्राह्मण बालक का रूप धर
कर कर हनुमानजी सेवा में जुट गए। निस्वार्थ सेवा देखकर ब्राह्मणों ने हनुमानजी से वर माँगने को कहा।
इस पर हनुमान ने विनम्रतापूर्वक कहा- प्रभु, आप प्रसन्न हैं तो जिस मंत्र से यज्ञ कर रहे हैं, उसका एक
अक्षर मेरे कहने से बदल जाता है। ब्राह्मण इस रहस्य को समझने को संभव नहीं है। मंत्र में जयादेवी ...
भुरहरिणी में 'ह' के स्थान पर 'क' उच्चारित करें, यही मेरी इच्छा है। [
भृतहरिणी यानी कि प्राणियों की पीड़ा हरने वाली और कर करनी ’का अर्थ हो गया प्राणियों को पीड़ित करने वाली
, जिससे देवी रुष्ट हो गईं और रावण का सर्वनाश करवा दिया। हनुमानजी महाराज ने श्लोक में 'ह' की जगह 'क'
करवाकर रावण के यज्ञ की दिशा ही बदल दी।
, जिससे देवी रुष्ट हो गईं और रावण का सर्वनाश करवा दिया। हनुमानजी महाराज ने श्लोक में 'ह' की जगह 'क'
करवाकर रावण के यज्ञ की दिशा ही बदल दी।
इस पर्व से जुड़ी एक अन्य कथा के अनुसार देवी दुर्गा ने एक भैंस रूपी असुर यानी महिषासुर का वध किया था।
पौराणिक कथाओं के अनुसार महिषासुर के एकाग्र ध्यान से बाध्य देवताओं ने उसे अजय होने का वरदान दे दिया।
उसे वरदान देने के बाद भगवान को चिंता हुई कि वह अब अपनी शक्ति का गलत प्रयोग करेगा, और प्रत्याशित
प्रतिफल स्वरूप महिषासुर ने नरक का विस्तार स्वर्ग के द्वार तक कर दिया और उसके इस कृत्य को देख देवता
विस्मय की स्थिति में आ गए। महिषासुर ने सूर्य, इन्द्र, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, यम, वरुण और अन्य देवताओं के सभी
अधिकार छीन लिए थे और स्वयं सुपगलोक का मालिक बन बैठा। भगवान को महिषासुर के प्रकोप से पृथ्वी पर
विचरण करना पड़ रहा था। तब महिषासुर के इस दुस्साहस से क्रोधित होकर देवताओं ने देवी दुर्गा की रचना की।
ऐसा माना जाता है कि देवी दुर्गा के निर्माण में सभी देवताओं का एक समान बल लगाया गया था। महिषासुर का
नाश करने
के लिए सभी देवताओं ने अपने अस्त्र देव दुर्गा को दिए थे और इन देवताओं के सम्मिलित प्रयास से देवी दुर्गा और
बलवान हो गए थे। ये नौ दिन देवी-महिषासुर संग्राम हुआ और अंत में महिषासुर- वध कर महिषासुर मर्दिनी
कहलायीं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार महिषासुर के एकाग्र ध्यान से बाध्य देवताओं ने उसे अजय होने का वरदान दे दिया।
उसे वरदान देने के बाद भगवान को चिंता हुई कि वह अब अपनी शक्ति का गलत प्रयोग करेगा, और प्रत्याशित
प्रतिफल स्वरूप महिषासुर ने नरक का विस्तार स्वर्ग के द्वार तक कर दिया और उसके इस कृत्य को देख देवता
विस्मय की स्थिति में आ गए। महिषासुर ने सूर्य, इन्द्र, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, यम, वरुण और अन्य देवताओं के सभी
अधिकार छीन लिए थे और स्वयं सुपगलोक का मालिक बन बैठा। भगवान को महिषासुर के प्रकोप से पृथ्वी पर
विचरण करना पड़ रहा था। तब महिषासुर के इस दुस्साहस से क्रोधित होकर देवताओं ने देवी दुर्गा की रचना की।
ऐसा माना जाता है कि देवी दुर्गा के निर्माण में सभी देवताओं का एक समान बल लगाया गया था। महिषासुर का
नाश करने
के लिए सभी देवताओं ने अपने अस्त्र देव दुर्गा को दिए थे और इन देवताओं के सम्मिलित प्रयास से देवी दुर्गा और
बलवान हो गए थे। ये नौ दिन देवी-महिषासुर संग्राम हुआ और अंत में महिषासुर- वध कर महिषासुर मर्दिनी
कहलायीं।
चौमासे में जो कार्य प्रायोजित किए गए होते हैं, उनके आरंभ के साधन उसी दिन से जुटाए जाते हैं। क्षत्रियों
का यह बहुत बड़ा त्योहार है। इस दिन ब्राह्मण सरस्वती
-पूजन और क्षत्रिय शस्त्र-पूजन आरंभ करते हैं।
विजयादशमी या दशहरा एक राष्ट्रीय पर्व है। अर्थात
जिन शुक्ल दशमी को सायंकाल तारा उदय होने के
समय 'विजयकाल' रहता है। यह सभी कार्यों को सिद्ध
करता है। पापिन शुक्ल दशमी पूर्वविरोध विरोधाभास पर,
भावना भावना शुद्ध और श्रवण नक्षत्रयुक्त सूर्योदय कविपिनी प्रदर्शनकारी है। अपराह्न काल, श्रवण नक्षत्र और
दशमी का प्रारंभ विजय यात्रा का मुहूर्त माना गया है। दुर्गा-विसर्जन, अपराजिता पूजन, विजय-प्रयाग, शमी पूजन
और नवरात्र-पारण इस पर्व के महान कर्म हैं। इस दिन संध्या के समय नीलकंठ पक्षी का दर्शन शुभ माना जाता है।
क्षत्रिय / राजपूतों इस दिन प्रात: स्नानादि नित्य कर्म से निवृत्त होकर संकल्प मंत्र लेते हैं। इसके पश्चात देवता,
गुरुजन, अस्त्र-शस्त्र, अश्व आदि के यथा पद्धति पूजन की परंपरा है। नवरात्रि के दौरान कुछ भक्तों उपवास
और प्रार्थना , स्वास्थ्य और समृद्धि के संरक्षण के लिए रख रहे हैं। भक्त इस व्रत के समय मांस, शराब, अनाज,
गेहूं और प्याज नहीं खाते। नवरात्रि और मौसमी परिवर्तन के काल के दौरान अनाज आम तौर पर परहेज कर
दिया जाता है क्योंकि मानते है कि अनाज नकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करता है। नवरात्रि आत्मनिरीक्षण
और शुद्धि का अवधि है और पारंपरिक रूप से नए उद्यम शुरू करने के लिए एक शुभ और धार्मिक समय है।


















